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बच्चों को शिक्षा गुरुकुल

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बच्चों को शिक्षा गुरुकुल

प्राचीन काल में बच्चों को शिक्षा गुरुकुल में दी जाती थी। गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण करना आसान नहीं होता था। क्योंकि, बच्चे को अपने रहने की जगह को खुद साफ करना पड़ता था। कपड़े खुद धुलने पड़ते थे। खाना बनाने में सहयोग करना पड़ता था। इसके साथ-साथ गुरुकुल की सफाई भी करनी पड़ती थी।

इसका प्रमुख कारण बच्चे को हर तरह की शिक्षा से अवगत करवाना होता था। चाहे वह भौतिक, आध्यात्मिक अथवा व्यवहारिक किसी भी प्रकार की शिक्षा हो। एक बार एक बच्चा जिसका नाम वरदराज था। अपने माता-पिता के साथ शिक्षा ग्रहण करने के लिए गुरुकुल में आया। अन्य बच्चों की तरह उस बच्चे का दाखिल गुरुकुल में हो गया।

कुछ ही दिनों में अन्य बच्चों के साथ वरदराज घुल-मिल गया। लेकिन, गुरुकुल की शिक्षा उसे अन्य बच्चों की तरह समझ नहीं आ रहा था। उसे जो भी पढ़ाया जा रहा था उसकी समझ में नहीं आता था। आचार्य वरदराज पर विशेष ध्यान देने लगे। उन्होंने कई तरह से उसे समझाने को कोशिश की लेकिन वह समझ नहीं आ रहा था। क्योंकि उसके अंदर आत्मविश्वास की कमी थी।

परीक्षा होती हैं, आश्रम के सभी बच्चे पास होकर अगली कक्षा में चले जाते। लेकिन, वरदराज परीक्षा को पास नहीं कर सका। एक दिन थक-हार कर आचार्य ने वरदराज को अपने पास बुलाया और कहा, “बेटा शिक्षा, तुम्हारे नसीब में नहीं लिखी हैं। तुम अपने घर जाओ और वही कुछ करो।” इस गुरुकुल में रहकर अपना समय बर्बाद मत करो।

वरदराज ने भी सोचा शायद सच में शिक्षा मेरे भाग्य में नहीं लिखा। आचार्य ने चने का सत्तू देते हुए कहा, “बेटा वरदराज, बीच रास्ते में तुम्हें भूख लगे तो खा लेना। वरदराज सत्तू लेकर आचार्य को प्राणम करके अपने घर को निकल गया। चलते-चलते बीच रास्ते में वरदराज को तेज की भूख लगी। उसने सोचा क्यों न सत्तू खा ले जिससे भूख मिट जाए।

एक कुआं देखकर वरदराज वही बैठकर सत्तू खा लिया। जब वह पानी के लिए कुएं पर गया तो देखा एक महिला कुएं से पानी निकाल रही थी। उसने महिला से पानी देने के लिए आग्रह किया। तभी वरदराज की निगह पानी निकलने वाले पत्थर के पहिये पर पड़ी। उसने तुरंत उस महिला से पूछा, इस पत्थर पर आपने निशान क्यों बनाया हैं?

महिला ने वरदराज को जबाब दिया, “मैंने नहीं इस रस्सी ने पत्थर के ऊपर निशान बनाया हैं।” वरदराज ने बड़ी उत्सुकता से पूछा कैसे? महिला ने जबाब दिया, “इस रस्सी के बार-बार आने जाने की वजह से इस पत्थर पर निशान बना हैं।” महिला की बात सुनकर वरदराज गहन मुद्रा में चिंतान करने लगा।

वरदराज के दिमाग में एक बात बैठ गई कि जब एक रस्सी के बार-बार आने-जाने से कठोर पत्थर पर अपना निशान बना सकती हैं तो मेहनत, लगन और निरंतर प्रयास से मैं शिक्षा क्यों नहीं ग्रहण कर सकता? वरदराज ने अपने ऊपर आत्मविश्वाश के साथ दृढ़ निश्चय किया कि वह शिक्षा ग्रहण करेगा। वह वापस गुरकुल को चला गया। और उसने पूरी मेहनत और लगन के साथ शिक्षा प्राप्त करने में लग गया।

निरतंर लगन के कारण कुछ ही दिनों में वरदराज को आचार्य की हर बातें समझ में आने लगी। इस तरह से यही वरदराज आगे चलकर संस्कृत व्याकरण का महान ज्ञाता बना।

नैतिक सीख:

इस दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं हैं। बशर्ते आपके अंदर उस चीज को पाने की तीव्र इच्छा होनी चाहिए।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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